Jul
7
Written by:
vivek pandey
07/07/2008 00:07
एह्शाश
नहीं जमीं मुठ्ठी भर तो क्या सपनों का आकाश बहुत है ,
उड़ पाऊं कभी न लेकिन पंखों का आकाश बहुत है ..
यूं तो जुड़ते ओउर बिछुड़ते हैं कई हमराह मगर साथ चल रहा अब तक मेरे बस मेरा विश्वाश बहुत है ...
क्यों हों निराश जो कोयल इस बार न कूंकी बगिया में ,
गुजर गया ये मौसम तो क्या जीवन में मधुमाश बहुत है ..
मिट जाते हैं साक्ष्य मगर एह्शाश शेष रह जाते हैं .
खंडहरों से झांक रहा महलों का इतिहाश बहुत है ,
दर्द दबा लेना अन्तर में इतना सहज नहीं होता
साँझ ढले अक्षर हो जाता मेरा मन उदाश बहुत है
खामोंशी की फांद दीवारें ,तन्हाई के सायों में
डोर पकड़ सुपधियों के आता कोई मन के पास बहुत है ,
तुला हुआ जीवन वचनों में ,कदम बंधें संकल्पों में
कैशे लौटूं अभी अयोध्या शेष अभी वन्वाश बहुत है ......
| Liked this blog? Share it on - |
|
|
4 comment(s) so far...
Re: एह्शाश
Kya bhai is it your copy right blog!!!! But really very nice one!!!!!
By mohit_0529 on
23/06/2008 17:20
|
Re: एह्शाश
Mitra aur kuch bhi likhiye.
By Ashu on
06/07/2008 16:38
|
Re: एह्शाश
आप सभी पाठक वर्ग को टिप्पडी लिए धन्यवाद आशा है की आप लोग यूँ ही इस ब्लॉग पैर अपने विचार प्रश्तुत्त करते रहेंगे जय हिन्द
By vivek kumar pandey on
06/07/2008 16:43
|
Re: एह्शाश
last line is the best
By ankitsinha on
19/07/2008 10:25
|